Math Classes By TheAdilStudy
अध्याय 1. परिमेय संख्याएं |
पाठ परिचय-
इस अध्याय में हम परिमेय संख्याओं (Rational Numbers) के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे। सबसे पहले हम जानेंगे कि परिमेय संख्या क्या होती है और इसके बाद परिमेय संख्याओं पर होने वाली विभिन्न संक्रियाओं, जैसे जोड़, घटाव, गुणा तथा भाग को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे।
इसके साथ ही हम निम्नलिखित महत्वपूर्ण विषयों का भी अध्ययन करेंगे—
- परिमेय संख्याएँ किन-किन संक्रियाओं के अंतर्गत संवृत (Closure) होती हैं?
- परिमेय संख्याओं के लिए योग तथा गुणन के गुणधर्म।
- क्रम-विनिमेय (Commutative) एवं साहचर्य (Associative) गुणधर्म।
- योज्य तत्समक (Additive Identity) तथा गुणनात्मक तत्समक (Multiplicative Identity)।
- योज्य व्युत्क्रम (Additive Inverse) तथा गुणनात्मक प्रतिलोम (Multiplicative Inverse)।
इस अध्याय के अंत तक आप इन सभी अवधारणाओं को उदाहरणों और अभ्यास प्रश्नों की सहायता से अच्छी तरह समझ सकेंगे।
महत्वपूर्ण तथ्य -
- यदि समीकरण X+5=15 को हल करने पर X=10 प्राप्त होता है, तो 10 एक प्राकृत संख्या है तथा यह समीकरण को संतुष्ट करता है।
- अगर किसी समीकरण X + 25 = 10 को हल करें तो हमे -15 प्राप्त होते हैं | X का ये मान समीकरण को संतुष्ट करता है |हल -15 एक पूर्णांक है |
- यदि समीकरण 8X=15 को हल करें, तो \(\frac{15}{8}\) प्राप्त होते हैं | जो एक परिमेय संख्या हैं |
ऊपर दिए गए उदाहरणों से हमें यह पता चलता है कि समीकरणों को हल करने के लिए प्राकृत, पूर्ण, पूर्णांक तथा परिमेय संख्याओं की आवश्यकता पड़ती है।
संवृत होना -
यदि किसी संख्या समूह की किन्हीं दो संख्याओं पर किसी संक्रिया (जोड़, घटाव, गुणा या भाग) का परिणाम भी उसी संख्या समूह का सदस्य हो, तो उस संख्या समूह को उस संक्रिया के अंतर्गत संवृत (Closed) कहा जाता है।
इस तथ्य को हम आगे दी गई जानकारी से समझेंगे |
पूर्ण संख्या का संवृत होना |
योग -
अगर हम 0 + 10 = 10 को देखें तो हमे पता चलता है के 0 और 10 दोनों पूर्ण संख्याएँ हैं तथा इनका योग 10 भी एक पूर्ण संख्या है।किसी दूसरी पूर्ण संख्या 10 को जोड़ने पर उसी संख्या समूह की संख्या मिल रही है |
अतः पूर्ण संख्या योग के अंतर्गत संवृत हैं |
व्यवकलन यानि घटाव -
अगर हम 7 - 9 = -2 को देखें तो हमे पता चलता है के 7 एक पूर्ण संख्या है जिसके साथ किसी दूसरी पूर्ण संख्या 9को घटाने पर उसी संख्या समूह की संख्या नहीं मिल रही है उत्तर -2 आता है जो की एक पूर्णांक हैं )
अतः पूर्ण संख्या व्यवकलन के अंतर्गत संवृत नहीं हैं |
गुणन -
अगर हम 5 x 0 = 0 को देखें तो हमे पता चलता है के 0 और 10 दोनों पूर्ण संख्याएँ हैं तथा इनका योग 10 भी एक पूर्ण संख्या है। किसी दूसरी पूर्ण संख्या 5 को गुणा पर उसी संख्या समूह की संख्या मिल रही है |
अतः पूर्ण संख्या गुणा के अंतर्गत संवृत हैं |
भाग -
अगर हम 5 ÷ 2 = \(\frac{5}{2}\) को देखें तो हमे पता चलता है कि यह पूर्ण संख्या नहीं है।
अतः पूर्ण संख्याएँ भाग के अंतर्गत संवृत नहीं हैं।
पूर्णांक संख्या का संवृत होना |
योग -
अगर हम -7 + 3 = -4 को देखें तो हमे पता चलता है के -4 एक पूर्णांक संख्या है जिसके साथ किसी दूसरी पूर्णांक संख्या 10 को जोड़ने पर उसी संख्या समूह की संख्या मिल रही है |
अतः पूर्णांक संख्या योग के अंतर्गत संवृत हैं |
व्यवकलन यानि घटाव -
अगर हम -19 - 9 = -28 को देखें तो हमे पता चलता है के -19 एक पूर्णांक संख्या है जिसके साथ किसी संख्या किसी दूसरी पूर्णांक संख्या -9 को घटाने पर उसी संख्या समूह की संख्या मिल रही है उत्तर -28 आता है जो की एक पूर्णांक हैं )
अतः पूर्णांक संख्याएँ व्यवकलन के अंतर्गत संवृत हैं।
गुणन -
अगर हम 8 x -18 = -144 देखें तो हमे पता चलता है के 8 एक पूर्णांक संख्या है जिसके साथ किसी दूसरी पूर्णांक संख्या -18 को गुणा पर उसी संख्या समूह की संख्या -144 मिल रही है |
अतः पूर्णांक संख्या गुणा के अंतर्गत संवृत हैं |
भाग -
अगर हम 1 ÷ 2 = \(\frac{1}{2}\) को देखें तो हमे पता चलता है कि 1 यह पूर्णांक संख्या 2 का भाग दें तो \(\frac{1}{2}\) प्राप्त होता है |
अतः पूर्णांक संख्याएँ भाग के अंतर्गत संवृत नहीं हैं।
| परिमेय संख्याओं का संवृत होना
योग -
अगर हम \(\frac{2}{5} + \frac{3}{5} = \frac{5}{5} = 1\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(\frac{2}{5}\) और \(\frac{3}{5}\) दोनों परिमेय संख्याएँ हैं तथा इनका योग 1 भी एक परिमेय संख्या है।
अतः परिमेय संख्याएँ योग के अंतर्गत संवृत हैं।
व्यवकलन यानी घटाव -
अगर हम \(\frac{7}{8} - \frac{3}{8} = \frac{4}{8} = \frac{1}{2}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(\frac{7}{8}\) और \(\frac{3}{8}\) दोनों परिमेय संख्याएँ हैं तथा इनका अंतर \(\frac{1}{2}\) भी एक परिमेय संख्या है।
अतः परिमेय संख्याएँ व्यवकलन (घटाव) के अंतर्गत संवृत हैं।
गुणन -
अगर हम \(\frac{2}{3} \times \frac{9}{4} = \frac{18}{12} = \frac{3}{2}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(\frac{2}{3}\) और \(\frac{9}{4}\) दोनों परिमेय संख्याएँ हैं तथा इनका गुणनफल \(\frac{3}{2}\) भी एक परिमेय संख्या है।
अतः परिमेय संख्याएँ गुणन के अंतर्गत संवृत हैं।
भाग -
अगर हम \(\frac{3}{4} \div \frac{2}{5} = \frac{3}{4} \times \frac{5}{2} = \frac{15}{8}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(\frac{3}{4}\) और \(\frac{2}{5}\) दोनों परिमेय संख्याएँ हैं तथा भागफल \(\frac{15}{8}\) भी एक परिमेय संख्या है।
अतः परिमेय संख्याएँ भाग के अंतर्गत भी संवृत हैं, बशर्ते भाजक (Divisor) शून्य न हो।
परिमेय संख्याओं का क्रम-विनिमेय गुणधर्म |
यदि किन्हीं दो परिमेय संख्याओं का योग या गुणन करते समय उनके स्थान बदल देने पर भी परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो इसे क्रम-विनिमेय गुणधर्म (Commutative Property) कहा जाता है।
योग -
अगर हम \(\frac{2}{7}+\frac{3}{7}=\frac{5}{7}\) को देखें तथा दूसरी ओर
\(\frac{3}{7}+\frac{2}{7}=\frac{5}{7}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में योग समान प्राप्त होता है।
अतः परिमेय संख्याएँ योग के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन करती हैं।
व्यवकलन यानी घटाव -
अगर हम \(\frac{5}{6}-\frac{1}{3}=\frac{1}{2}\) तथा
\(\frac{1}{3}-\frac{5}{6}=-\frac{1}{2}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में प्राप्त परिणाम समान नहीं हैं।
अतः परिमेय संख्याएँ व्यवकलन (घटाव) के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
गुणन -
अगर हम \(\frac{2}{3}\times\frac{5}{4}=\frac{5}{6}\) तथा
\(\frac{5}{4}\times\frac{2}{3}=\frac{5}{6}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में गुणनफल समान प्राप्त होता है।
अतः परिमेय संख्याएँ गुणन के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन करती हैं।
भाग -
अगर हम \(\frac{3}{4}\div\frac{1}{2}=\frac{3}{2}\) तथा
\(\frac{1}{2}\div\frac{3}{4}=\frac{2}{3}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में भागफल समान नहीं है।
अतः परिमेय संख्याएँ भाग के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
पूर्ण संख्याओं का क्रम-विनिमेय गुणधर्म |
यदि किन्हीं दो पूर्ण संख्याओं का योग या गुणन करते समय उनके स्थान बदल देने पर भी परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो इसे क्रम-विनिमेय गुणधर्म (Commutative Property) कहा जाता है।
योग -
अगर हम 8 + 15 = 23 को देखें तथा दूसरी ओर 15 + 8 = 23 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में योग समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्ण संख्याएँ योग के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन करती हैं।
व्यवकलन यानी घटाव -
अगर हम 12 - 5 = 7 तथा 5 - 12 = -7 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में प्राप्त परिणाम समान नहीं हैं।
अतः पूर्ण संख्याएँ व्यवकलन (घटाव) के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
गुणन -
अगर हम 6 × 4 = 24 तथा 4 × 6 = 24 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में गुणनफल समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्ण संख्याएँ गुणन के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन करती हैं।
भाग -
अगर हम 12 ÷ 3 = 4 तथा 3 ÷ 12 = 1/4 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में भागफल समान नहीं है। इसके अतिरिक्त 1/4 पूर्ण संख्या भी नहीं है।
अतः पूर्ण संख्याएँ भाग के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
पूर्णांक संख्याओं का क्रम-विनिमेय गुणधर्म |
यदि किन्हीं दो पूर्णांक संख्याओं का योग या गुणन करते समय उनके स्थान बदल देने पर भी परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो इसे क्रम-विनिमेय गुणधर्म (Commutative Property) कहा जाता है।
योग -
अगर हम -8 + 5 = -3 को देखें तथा दूसरी ओर 5 + (-8) = -3 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में योग समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्णांक संख्याएँ योग के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन करती हैं।
व्यवकलन यानी घटाव -
अगर हम 7 - (-2) = 9 तथा (-2) - 7 = -9 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में प्राप्त परिणाम समान नहीं हैं।
अतः पूर्णांक संख्याएँ व्यवकलन (घटाव) के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
गुणन -
अगर हम (-4) × 6 = -24 तथा 6 × (-4) = -24 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में गुणनफल समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्णांक संख्याएँ गुणन के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन करती हैं।
भाग -
अगर हम 8 ÷ (-2) = -4 तथा (-2) ÷ 8 = -1/4 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में भागफल समान नहीं है। इसके अतिरिक्त -1/4 एक पूर्णांक संख्या नहीं है।
अतः पूर्णांक संख्याएँ भाग के अंतर्गत क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
परिमेय संख्याओं का साहचर्य गुणधर्म |
यदि तीन परिमेय संख्याओं का योग या गुणन करते समय कोष्ठकों (Brackets) का स्थान बदल देने पर भी परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो इसे साहचर्य गुणधर्म (Associative Property) कहा जाता है।
योग -
अगर हम \((\frac{1}{2}+\frac{1}{3})+\frac{1}{6}=1\) तथा
\(\frac{1}{2}+(\frac{1}{3}+\frac{1}{6})=1\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में योग समान प्राप्त होता है।
अतः परिमेय संख्याएँ योग के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन करती हैं।
व्यवकलन यानी घटाव -
अगर हम \((\frac{5}{6}-\frac{1}{3})-\frac{1}{6}=\frac{1}{3}\) तथा
\(\frac{5}{6}-(\frac{1}{3}-\frac{1}{6})=\frac{2}{3}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में प्राप्त परिणाम समान नहीं हैं।
अतः परिमेय संख्याएँ व्यवकलन (घटाव) के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
गुणन -
अगर हम \((\frac{2}{3}\times\frac{3}{5})\times\frac{5}{4}=\frac{1}{2}\) तथा
\(\frac{2}{3}\times(\frac{3}{5}\times\frac{5}{4})=\frac{1}{2}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में गुणनफल समान प्राप्त होता है।
अतः परिमेय संख्याएँ गुणन के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन करती हैं।
भाग -
अगर हम \((\frac{3}{4}\div\frac{1}{2})\div\frac{3}{2}=1\) तथा
\(\frac{3}{4}\div(\frac{1}{2}\div\frac{3}{2})=\frac{9}{4}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में भागफल समान नहीं है।
अतः परिमेय संख्याएँ भाग के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
पूर्णांक संख्याओं का साहचर्य गुणधर्म |
यदि तीन पूर्णांक संख्याओं का योग या गुणन करते समय कोष्ठकों (Brackets) का स्थान बदल देने पर भी परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो इसे साहचर्य गुणधर्म (Associative Property) कहा जाता है।
योग -
अगर हम (5 + (-3)) + 4 = 6 तथा 5 + ((-3) + 4) = 6 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में योग समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्णांक संख्याएँ योग के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन करती हैं।
व्यवकलन यानी घटाव -
अगर हम (8 - 5) - 2 = 1 तथा 8 - (5 - 2) = 5 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में प्राप्त परिणाम समान नहीं हैं।
अतः पूर्णांक संख्याएँ व्यवकलन (घटाव) के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
गुणन -
अगर हम ((-2) × 3) × 4 = -24 तथा (-2) × (3 × 4) = -24 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में गुणनफल समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्णांक संख्याएँ गुणन के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन करती हैं।
भाग -
अगर हम (24 ÷ 6) ÷ 2 = 2 तथा 24 ÷ (6 ÷ 2) = 8 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में भागफल समान नहीं है।
अतः पूर्णांक संख्याएँ भाग के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
पूर्ण संख्याओं का साहचर्य गुणधर्म |
यदि तीन पूर्ण संख्याओं का योग या गुणन करते समय कोष्ठकों (Brackets) का स्थान बदल देने पर भी परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो इसे साहचर्य गुणधर्म (Associative Property) कहा जाता है।
योग -
अगर हम (8 + 5) + 7 = 20 तथा 8 + (5 + 7) = 20 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में योग समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्ण संख्याएँ योग के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन करती हैं।
व्यवकलन यानी घटाव -
अगर हम (15 - 8) - 3 = 4 तथा 15 - (8 - 3) = 10 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में प्राप्त परिणाम समान नहीं हैं।
अतः पूर्ण संख्याएँ व्यवकलन (घटाव) के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
गुणन -
अगर हम (2 × 5) × 4 = 40 तथा 2 × (5 × 4) = 40 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में गुणनफल समान प्राप्त होता है।
अतः पूर्ण संख्याएँ गुणन के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन करती हैं।
भाग -
अगर हम (24 ÷ 6) ÷ 2 = 2 तथा 24 ÷ (6 ÷ 2) = 8 को देखें, तो हमें पता चलता है कि दोनों स्थितियों में भागफल समान नहीं है। इसके अतिरिक्त दूसरे उदाहरण में कोष्ठकों का स्थान बदलने पर परिणाम भी बदल जाता है।
अतः पूर्ण संख्याएँ भाग के अंतर्गत साहचर्य गुणधर्म का पालन नहीं करती हैं।
परिमेय संख्याओं का योज्य तत्समक (Additive Identity)
यदि किसी परिमेय संख्या में 0 जोड़ने पर वही परिमेय संख्या प्राप्त होती है, तो 0 को उस संख्या का योज्य तत्समक (Additive Identity) कहा जाता है।
उदाहरण 1 -
अगर हम \(\frac{5}{8}+0=\frac{5}{8}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि 0 जोड़ने पर संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
अतः 0 परिमेय संख्याओं का योज्य तत्समक है।
उदाहरण 2 -
अगर हम \(-\frac{7}{9}+0=-\frac{7}{9}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि ऋणात्मक परिमेय संख्या में भी 0 जोड़ने पर वही संख्या प्राप्त होती है।
अतः 0 प्रत्येक परिमेय संख्या का योज्य तत्समक होता है।
निष्कर्ष -
परिमेय संख्याओं में 0 जोड़ने पर संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता, इसलिए 0 परिमेय संख्याओं का योज्य तत्समक (Additive Identity) कहलाता है।
परिमेय संख्याओं का गुणनात्मक तत्समक (Multiplicative Identity)
यदि किसी परिमेय संख्या को 1 से गुणा करने पर वही परिमेय संख्या प्राप्त होती है, तो 1 को उस संख्या का गुणनात्मक तत्समक (Multiplicative Identity) कहा जाता है।
उदाहरण 1 -
अगर हम \(\frac{7}{9}\times1=\frac{7}{9}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि 1 से गुणा करने पर संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
अतः 1 परिमेय संख्याओं का गुणनात्मक तत्समक है।
उदाहरण 2 -
अगर हम \(-\frac{5}{8}\times1=-\frac{5}{8}\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि ऋणात्मक परिमेय संख्या में भी 1 से गुणा करने पर वही संख्या प्राप्त होती है।
अतः 1 प्रत्येक परिमेय संख्या का गुणनात्मक तत्समक होता है।
निष्कर्ष -
परिमेय संख्याओं में 1 से गुणा करने पर संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता, इसलिए 1 परिमेय संख्याओं का गुणनात्मक तत्समक (Multiplicative Identity) कहलाता है।
परिमेय संख्याओं का योज्य व्युत्क्रम (Additive Inverse)
यदि किसी परिमेय संख्या में उसकी विपरीत (ऋणात्मक अथवा धनात्मक) संख्या जोड़ने पर परिणाम 0 प्राप्त हो, तो उस विपरीत संख्या को योज्य व्युत्क्रम (Additive Inverse) कहा जाता है।
उदाहरण 1 -
अगर हम \(\frac{5}{8}+(-\frac{5}{8})=0\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(-\frac{5}{8}\), \(\frac{5}{8}\) का योज्य व्युत्क्रम है।
अतः \(-\frac{5}{8}\), \(\frac{5}{8}\) का योज्य व्युत्क्रम है।
उदाहरण 2 -
अगर हम \(-\frac{7}{9}+\frac{7}{9}=0\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(\frac{7}{9}\), \(-\frac{7}{9}\) का योज्य व्युत्क्रम है।
अतः प्रत्येक परिमेय संख्या का एक योज्य व्युत्क्रम होता है।
निष्कर्ष -
किसी भी परिमेय संख्या का योज्य व्युत्क्रम वह संख्या होती है जिसे जोड़ने पर परिणाम 0 प्राप्त हो।
परिमेय संख्याओं का गुणनात्मक प्रतिलोम (Multiplicative Inverse)
यदि किसी शून्येतर परिमेय संख्या को उसके उल्टे (Reciprocal) से गुणा करने पर परिणाम 1 प्राप्त हो, तो उस उल्टी संख्या को गुणनात्मक प्रतिलोम (Multiplicative Inverse) कहा जाता है।
उदाहरण 1 -
अगर हम \(\frac{3}{5}\times\frac{5}{3}=1\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(\frac{5}{3}\), \(\frac{3}{5}\) का गुणनात्मक प्रतिलोम है।
अतः \(\frac{5}{3}\), \(\frac{3}{5}\) का गुणनात्मक प्रतिलोम है।
उदाहरण 2 -
अगर हम \(-\frac{7}{8}\times-\frac{8}{7}=1\) को देखें, तो हमें पता चलता है कि \(-\frac{8}{7}\), \(-\frac{7}{8}\) का गुणनात्मक प्रतिलोम है।
अतः प्रत्येक शून्येतर परिमेय संख्या का गुणनात्मक प्रतिलोम होता है।
महत्वपूर्ण -
0 का गुणनात्मक प्रतिलोम नहीं होता, क्योंकि किसी भी संख्या से गुणा करने पर 0 का परिणाम 1 नहीं हो सकता।
निष्कर्ष -
प्रत्येक शून्येतर परिमेय संख्या का गुणनात्मक प्रतिलोम होता है तथा किसी संख्या को उसके गुणनात्मक प्रतिलोम से गुणा करने पर परिणाम 1 प्राप्त होता है।
अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- परिमेय संख्या का मानक रूप क्या होता है?
- (A) p + q
- (B) p/q जहाँ q ≠ 0 ✔
- (C) p × q
- (D) इनमें से कोई नहीं
- 0 का गुणनात्मक प्रतिलोम होता है?
- (A) 0
- (B) 1
- (C) नहीं होता ✔
- (D) -1
- परिमेय संख्याएँ किस संक्रिया के अंतर्गत संवृत हैं?
- (A) जोड़
- (B) घटाव
- (C) गुणा
- (D) उपरोक्त सभी (भाग में भाजक शून्य न हो) ✔
रिक्त स्थान भरिए
- 0 परिमेय संख्याओं का ___________ है।
- 1 परिमेय संख्याओं का ___________ है।
- प्रत्येक शून्येतर परिमेय संख्या का ___________ होता है।
- परिमेय संख्या का हर कभी ___________ नहीं होता।
- क्रम-विनिमेय गुणधर्म ___________ तथा ___________ में लागू होता है।
सही / गलत लिखिए
- 0 का गुणनात्मक प्रतिलोम होता है।
- परिमेय संख्याएँ जोड़ के अंतर्गत संवृत होती हैं।
- भाग क्रम-विनिमेय गुणधर्म का पालन करता है।
- प्रत्येक पूर्णांक एक परिमेय संख्या है।
- 1 गुणनात्मक तत्समक है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
- परिमेय संख्या की परिभाषा लिखिए।
- संवृत गुणधर्म क्या है?
- क्रम-विनिमेय गुणधर्म उदाहरण सहित समझाइए।
- साहचर्य गुणधर्म क्या है?
- योज्य तत्समक किसे कहते हैं?
- गुणनात्मक तत्समक क्या है?
- योज्य व्युत्क्रम क्या होता है?
- 0 का गुणनात्मक प्रतिलोम क्यों नहीं होता?
- परिमेय संख्याओं का मानक रूप लिखिए।
- किसी परिमेय संख्या का गुणनात्मक प्रतिलोम कैसे ज्ञात करते हैं?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. परिमेय संख्या क्या होती है?
जिस संख्या को p/q के रूप में लिखा जा सके, जहाँ q ≠ 0 हो, उसे परिमेय संख्या कहते हैं।
Q2. क्या सभी पूर्णांक परिमेय संख्या होते हैं?
हाँ। प्रत्येक पूर्णांक को हर 1 के साथ भिन्न के रूप में लिखा जा सकता है।
Q3. क्या 0 एक परिमेय संख्या है?
हाँ। क्योंकि 0 = 0/1 लिखा जा सकता है।
Q4. 0 का गुणनात्मक प्रतिलोम क्यों नहीं होता?
क्योंकि ऐसी कोई संख्या नहीं है जिसे 0 से गुणा करने पर परिणाम 1 प्राप्त हो।
Q5. क्या परिमेय संख्याएँ भाग के अंतर्गत संवृत होती हैं?
हाँ, लेकिन भाजक (Divisor) शून्य नहीं होना चाहिए।
Q6. योज्य तत्समक क्या है?
0 योज्य तत्समक है क्योंकि किसी भी परिमेय संख्या में 0 जोड़ने पर वही संख्या प्राप्त होती है।
Q7. गुणनात्मक तत्समक क्या है?
1 गुणनात्मक तत्समक है क्योंकि किसी भी परिमेय संख्या को 1 से गुणा करने पर वही संख्या प्राप्त होती है।
Q8. गुणनात्मक प्रतिलोम क्या होता है?
किसी शून्येतर परिमेय संख्या का उल्टा (Reciprocal) उसका गुणनात्मक प्रतिलोम कहलाता है।
अध्याय का सार (Summary)
इस अध्याय में हमने परिमेय संख्याओं की परिभाषा, मानक रूप तथा उनके विभिन्न गुणधर्मों का विस्तार से अध्ययन किया। हमने जाना कि परिमेय संख्याएँ जोड़, घटाव, गुणा तथा (भाजक शून्य न होने पर) भाग के अंतर्गत संवृत होती हैं।
इसके अतिरिक्त हमने क्रम-विनिमेय गुणधर्म, साहचर्य गुणधर्म, योज्य तत्समक, गुणनात्मक तत्समक, योज्य व्युत्क्रम तथा गुणनात्मक प्रतिलोम को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझा।
अब आप परिमेय संख्याओं से संबंधित प्रश्नों को अधिक आत्मविश्वास के साथ हल कर सकते हैं तथा आगे आने वाले गणित के अध्यायों को आसानी से समझ पाएँगे।
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